Sunday, November 27, 2022
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पहला प्यार: कोयल दी के पहले प्यार से सोनाली को भी मोहब्बत हो गई, लेकिन वासु दा को दोनों ही न पा सकीं


29 मिनट पहले

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कभी कभी आपका अतीत आपको पुकारता है। अतीत की बहुत सी बातें समानांतर चलती हैं। अतीत याद करने की मांग करता है लेकिन क्या, किसे और कितना याद किया जाए ये नहीं बताता। कुछ यादें तो ताउम्र साथ चलती हैं और कुछ बिल्कुल ही भुला दी जाती हैं।

मेरी यादों में कोयल दी और वासु दा हमेशा ही बसे रहे। कितना समय हुआ उस शहर को छोड़े हुए। वर्ष 1995… 96… या 97… उन दिनों बेसिक फोन हुआ करते थे, वो भी चंद कुछ ही घरों में। उस शहर को, उस घर को छोड़ते हुए कितना अकुलाई थी मैं। आज भी सोचती हूं तो मन में कुछ उमड़ने लगता है।

कोयल दी अतीत से निकल कर वर्तमान में कभी न आ पातीं अगर उस दिन मेरे मोबाइल पर एक अंजाना नंबर से कॉल न आया होता। आमतौर पर किसी भी अंजान फोन नंबर से आया हुआ कॉल मैं उठाती नहीं, लेकिन उस दिन जाने कैसे उठा लिया। वो एक अंजानी आवाज थी जिसे धीरे-धीरे मैंने पहचान लिया। बरसों पुरानी उस आवाज को पहचानते हुए मैं अनायास ही खुश हो गई, “कैसी हो कोयल दी? कहां हो ? वासु दा कैसे हैं?’’

“तू अपनामैसेंजर कभी देखती नहीं क्या? कितने जतन से तेरा फोन नंबर मिला मुझे। बस कुछ दिनों के लिए इंडिया आई हूं। मिलना चाहती हूं तुझसे। देखना चाहती हूं तुझे। आ सकेगी ?’’ कोयल दी का स्वर शिकायत भरा था। मैं खिसिया गई। इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट तो बना लिया था मैंने, लेकिन शायद ही कभी चेक करती थी। अपनी नौकरी से ही फुर्सत नहीं मिलती मुझे और अगर मिलती भी है तो मेरी और भी हॉबी हैं।

“वैसे दिल्ली अब इतनी भी दूर नहीं है लखनऊ से। कार से आ रही है तो एक्सप्रेस वे से चली आ वरना शताब्दी से आ जा। प्लेन का टाइम भी बताऊं क्या?’’ कोयल दी लगातार कहे जा रही थीं, “भले ही एक दिन के लिए आ सोना, लेकिन तुझे देखना चाहती हूं। शायद इसके बाद मैं इंडिया न आ सकूं।’’ कोयल दी की मीठी आवाज में कुछ ऐसा आग्रह था कि मैं आकुल-व्याकुल हो गई।

फिर एक कहानी याद आई। बरसों पहले की उस कुछ कुछ बड़ी होती लड़की की कहानी- हां, मेरी अपनी कहानी। मैं यानी सोनाली चटर्जी, आज की तारीख में उम्र तीस के पार, लेकिन पैंतीस से कम। एक अच्छी डिग्री के साथ एक बहुत अच्छी सरकारी नौकरी। साथ की लड़कियों की आहिस्ता आहिस्ता शादियां हो चुकी हैं या होने जा रही हैं। मेरे मां-बाबा की दिली ख्वाहिश है कि एक राजकुंवर सा दामाद बारात लेकर उनके द्वार पर आए और उनकी रानी बेटी को ब्याह कर अपने घर ले जाए।

जब भी घर जाती हूं- मां-बाबा के साथ ही साथ पड़ोस, नाते रिश्तेदार, यहां तक कि घर की महरी की आंखों में भी एक ही सवाल- सोना कब सेटल होगी? कब ब्याह करेगी सोना?

सेटल..? क्या अभी मैं सेटल नहीं हूं? पूछती हूं मैं अपने आप से। रही बात ब्याह करके सेटल हो जाने की तो क्या कहूं इसके बारे में। न जाने कब से मुझे लगता है कि कहीं कुछ खो गया है और उसी खोये हुए को ढूंढ रही हूं मैं। क्या कभी किसी से प्यार किया था मैंने? ऐसा तो नहीं है। फिर मन क्यों बंधा-बंधा सा लगता है? क्यों कोई मन को भाता ही नहीं?

अपनी कहानी के साथ एक और भी कहानी को जोड़ती हूं। ये कहानी है कोयल दी और वासु दा की। वासु दा, जिन्हें मैं बड़े भाई साहब कहा करती थी। न-न, प्रेमचंद वाले बड़े भाई साहब नहीं, बस वो कद और उम्र दोनों में मुझसे बड़े थे, बस इसीलिए। लेकिन ये बड़े भाई साहब वाला संबोधन आहिस्ता आहिस्ता बदल गया जब एक दिन कोयल दी ने उनके बारे में पूछते हुए मुझसे कहा, “कैसे हैं तेरे वासु दा?’’ बस ये संबोधन मुझे इतना प्यारा लगा कि मैं भी उन्हें वासु दा ही कहने लगी।

साल दर साल पीछे चलती हूं। मैं छोटी हो गई हूं। शायद बारह या तेरह बरस की। कोयल दी का वो घर तीन तल्ले का। बीच वाली मंजिल के किराएदार थे हम लोग और सबसे ऊपर वाली मंजिल था बस एक कमरा और छत। वासु दा वहां रह कर कम्पटीशन की तैयारी कर रहे थे। भले से लगते थे वासु दा। कहीं पार्ट टाइम नौकरी किया करते थे। उसके बाद कोचिंग, फिर अपनी पढ़ाई।

मैं उन दिनों नहीं समझ पाती थी कि वासु दा मुझे क्यों अच्छे लगते थे। उनकी उदास आंखें जो एक चुम्बक की तरह अपनी ओर खींचती थीं या उनके घने घुंघराले बाल या फिर उनकी गहरी आवाज का जादू। सब कुछ बहुत भाता था मुझे। उनके गुनगुनाने की आवाज निचली मंजिल तक चली जाती थी। हां, कोयल दी के घर तक, मुझे पता था।

वो दौर था जब शाहरुख खान और काजोल की फिल्मों की दीवानगी छाई थी लोगों पर। वासु दा तो शाहरुख खान की तरह नहीं लगते थे, लेकिन कोयल दी जरूर काजोल की तरह लगती थीं। दुबली सी कोयल दी, हंसमुख चेहरे वाली, चपल नैनों वाली। वो खूब अच्छा नाचतीं, खूब अच्छा गातीं। कोयल दी का परिवार सुखी और समृद्ध था। वे उच्चवर्गीय लोग थे। कोयल दी की हंसी खनकदार खिलखिलाहट वाली थी। उनकी सुंदरता और बात करने का तरीका मुझे मोहता था।

मैं उन दिनों स्कूल में पढ़ती थी। बहुत बार वासु दा से गणित के सवाल समझने जाया करती। इतने प्यार से वो हर सवाल का हल समझाते कि मैं निहाल हो जाती उन पर। खूब बातें किया करती थी मैं उनसे। वासु दा अक्सर कविता और कहानियों के अंश सुनाया करते। उनका ये अंदाज खूब भाता था मुझे।

कभी कभी कोयल दी के पास भी जाया करती थी मैं। कोयल दी अक्सर मुझसे वासु दा के विषय में पूछा करतीं। वासु दा को साहित्य पढ़ने का नशा था। उनके कमरे की अलमारी में ढेरों उपन्यास सजे रहते। शायद मुझे भी वहीं से साहित्य में डूबने की लत लगी थी।

एक दिन जब कोयल दी को मैंने वासु दा के इस शौक के बारे में बताया तो उनका चेहरा देखने लायक था। अगले ही दिन कोयल दी ने मुझे बुला कर दिखाया, उनके कमरे की शेल्फ भी आठ-दस साहित्यिक उपन्यासों से सज गई थी।

अब कोयल दी और वासु दा के बीच उपन्यासों का आदान प्रदान होने लगा था मेरे माध्यम से। फिर एक दिन मेरे साथ कोयल दी छत वाले कमरे में आईं। उनका चेहरा शर्म से गुलाबी था और हथेलियां पसीने से तर। वो मेरा हाथ अपनी हथेली में थामे हुए थीं। मैंने महसूस किया कि वो हल्के हल्के कांप रही थीं।

वासु दा और कोयल दी एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे एक दूसरे को बरसों से जानते हों। मैं वासु दा का कमरा निहार रही थी जो उन्होंने कोयल दी के आने की खुशी में व्यवस्थित किया था। गोल टेबल को कोने में रख दिया गया था। उस पर मेजपोश डाल कर गुलदस्ता रखा था जिसमें ताजे फूल थे। टेबल से लगी रैक पर ढेर सारे उपन्यास सजे थे। पलंग पर साफ सुथरी चादर बिछी थी। मैचिंग ही नीले छींट का तकिये का गिलाफ। अलमारी में छोटी सी भगवान की मूर्ति रखी थी। दिया धूप जल रहा था जिसकी महक कमरे भर में फैली थी।

मुझे आश्चर्य हुआ कि वासु दा पूजा पाठ भी करते हैं क्या? कोयल दी को देख कर वासु दा घबराए हुए थे, लेकिन वो कितने अच्छे लग रहे थे उस समय। गहरी नीली जीन्स पर केसरिया कुर्ता। सुंदर घने बाल माथे पर बिखर आए थे। कोयल दी और वासु दा धीरे धीरे बातें कर रहे थे और मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

उस दिन कोयल दी भी कितनी सुंदर दिख रही थीं। वासु दा की आंखें कोयल दी के चेहरे पर थीं। कोयल दी की मुस्कान बच्चों की तरह निर्दोष थी और चेहरे पर युवा मासूमियत। मैंने कामना करी कि काश, कोयल दी का ब्याह वासु दा के साथ हो जाए।

धीरे धीरे उनकी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कोयल दी काफी खुश होकर मुझे ये सब बताया करतीं। वे लोग अक्सर अपने अपने घरों से बाहर निकल कर मिलने लगे। रेस्टोरेंट्स, पार्क, मार्केट, मूवी। घर में किसी को पता ही नहीं चला। मैं लगातार डाकिया बनी उन दोनों के प्रेम पत्रों का आदान प्रदान करती रही।

कोयल दी मुझे बंद लिफाफों से निकाल कर इत्र में डूबे वासु दा के पत्र दिखातीं। कुछ उनके अंश पढ़ कर सुनातीं। उस इत्र की भीनी खुशबू मुझे भी महका देती, क्योंकि इतनी छोटी तो मैं भी नहीं थी। कोयल दी का चेहरा पढ़ कर मुझे भी सिहरन हो जाती। सोचती काश, कोई वासु दा जैसा मुझे भी मिलता। या फिर वासु दा ही क्यों नहीं? लेकिन मेरी और उनकी उम्र में अंतर भी तो था। मैं अपनी इस भावना को ईर्ष्या का नाम दे सकने का साहस नहीं कर सकी, क्योंकि वासु दा और कोयल दी की जोड़ी मेरे लिए आदर्श जोड़ी थी और मैं दोनों से ही प्यार करती थी।

मेरा दसवीं बोर्ड का इम्तहान था और मेरा लक्ष्य अच्छे नंबरों से पास होना था। सो मैंने खुद को पढ़ाई में झोंक दिया। इसी बीच अचानक वासु दा गांव चले गए। परिस्थितिवश उसी बीच हम लोग कोयल दी का किराये वाला घर छोड़ कर अपने पुश्तैनी घर में रहने जयपुर चले आए। ग्यारहवीं के पीसीएम ग्रुप की पढाई में धीरे-धीरे कोयल दी और वासु दा विस्मृत होते चले गए। दिमाग में अलजेब्रा, ट्रिग्नोमेट्री ही घूमता रहा।

जीवन आगे बढ़ता रहा। पिछला सब कुछ तो नहीं लेकिन बहुत कुछ छूट ही गया। कभी कभी एक धुंधली स्मृति हो आती वासु दा और कोयल दी की। सोचती कि कभी लखनऊ जाऊँगी तो कोयल दी के पास जरूर जाऊँगी। देखूंगी कि ब्याह के बाद वो कैसी लगती हैं। मैं देखना चाहती थी कि कोयल दी और वासु दा का परिवार, उनके बच्चे कैसे लगते हैं।

संयोग से कोयल दी के आग्रह पर मुझे लखनऊ आना ही पड़ा। शहर भले ही बदल गया था, लेकिन उस मोहल्ले की गलियां आज भी पुरानी थीं। उन्हीं पुरानी गलियों से गुजरती हुई मेरी सरकारी गाड़ी अचानक से एक चौड़ी गली के सामने आ कर रुकी। ये तो वही घर था जो बरसों पहले मुझसे छूट गया था।

गाड़ी का हॉर्न सुन कर जो स्त्री बाहर आई उसे दूर से पहचान पाना कठिन था मेरे लिए। गाड़ी से उतर कर आगे बढ़ी तो चेहरा पहचाना सा लगा। ओह, ये तो कोयल दी थीं। बॉय कट बाल, कुछ भारी शरीर, पैन्ट और टी शर्ट पहने, थोड़ी मर्दानी सी कोयल दी। वो बीते दिनों की मासूमियत, कोमलता, कहीं गुम थी।

मुझे गले लगा कर खुश थीं कोयल दी। बाहों में भर कर भीतर ले गईं। खूब प्यार से खातिर करती रहीं, बतियाती रहीं, लेकिन एक बार भी वासु दा का जिक्र नहीं आया।

छटपटा कर पूछ ही बैठी मैं, “कोयल दी, वासु दा कैसे हैं? तुम्हारा परिवार? तुम्हारे बच्चे?”

“वासु..?” कोयल दी एकदम से चुप हो गईं। कुछ पल चुप रहीं, फिर बोलीं, “ठीक ही होगा वो।’’

“ठीक का क्या मतलब? तुम्हारी शादी नहीं हुई क्या उनसे?’’

“कैसे होती? मैं सोचती थी कि वासु की कोई अच्छी सरकारी नौकरी लगेगी तब वो बाबा से मेरा हाथ मांगेगा, लेकिन एक क्लर्क के लिए…” कोयल दी शून्य में देख रही थीं, “मेरे किसी भी उपन्यास का नायक क्लर्क तो कतई नहीं था, फिर मेरे जीवन का नायक क्लर्क कैसे हो जाता। उन्हीं दिनों मेरे लिए एक एनआरआई का रिश्ता आया। घर-परिवार भी अच्छा था। उन लोगों को जल्दी थी। चट मंगनी पट ब्याह हो गया और मैं अमेरिका चली गई,’’ कोयल दी की आंखों में तरलता थी, “बीते कुछ बरसों में मां-बाबा दोनों नहीं रहे इसीलिए इस घर को बेचने का निर्णय लिया। इस बार जा कर शायद अब कभी न लौट सकूं।’’ उनका स्वर भर्रा गया।

“सुखी तो हो न कोयल दी?’’

“कह नहीं सकती कुछ पक्का। अगर धन-दौलत, रुपया-पैसा ही सुख की परिभाषा है तो शायद मैं सुखी हूं।’’ कोयल दी उदास थीं।

“वासु दा याद आते हैं?’’ मैंने उन्हें कुरेदा।

“पहला प्यार कोई भूलता है क्या कभी?’’ कोयल दी उदासी के साथ हंसी।

“अपने शहर लौटी हो तुम। वासु दा से मिलोगी नहीं?’’ एक बार मैंने फिर उनका मन टटोला।

“मुझे भी तो मिलना है उनसे। वासु यहीं सचिवालय कॉलोनी में रहता है। उसका पता और फोन नंबर है मेरे पास, लेकिन अपनी शादी के बाद मैं उससे कभी मिली नहीं, न ही कभी फोन किया उसे। तुझे पता और फोन नंबर देती हूं। जैसा मन करे।’’ कोयल दी के लिए अपने भावों को छिपा पाना कठिन हो रहा था।

वासु दा का पता खोजते हुए मैं उनके घर तक पहुंच ही गई। लाल छत वाले घरों की सरकारी कॉलोनी। छोटे-छोटे एक से खिलौने जैसे घर। ड्राइवर कार से उतर कर पता पूछने गया था कि सहसा मेरी सीट के बगल वाली खिड़की पर एक चेहरा दिखा, “क्षमा कीजियेगा, अगर मैं गलत नहीं हूं तो आप क्या सोनाली हैं? सोनाली चटर्जी?’’

मोबाइल में गुम सहसा चौंक पड़ी थी मैं। एक मध्यम आयु का व्यक्ति जिसे न प्रौढ़ कहा जा सकता था न ही युवा। चेहरे की रेखाएं कुछ-कुछ परिचित सी लगीं। फिर एक बिजली सी कौंध गई, “वासु दा!’’

हां, वो वासु दा ही तो थे। मुझे देख कर हंस पड़े। कुछ ही देर में उनके छोटे से घर की छोटी सी बैठक में बैठी थी मैं। वासु दा ठीक सामने वाली कुर्सी पर बैठे थे। मैं ढूंढ रही थी उनमें एक पुराना अक्स, खोई हुई परछाईं जैसा एक चेहरा, जिस पर समय की धूल चढ़ चुकी थी।

“वासु दा, अब भी गाना गाते हो?’’ एकाएक पूछ लिया मैंने।

“अब कहां सोना। अब तो गीतों के बोल ही खो गए जाने कहां।’’ वासु दा कहीं और देखते हुए बोले।

“और कहानी, कविता?’’

“भूल गए राग-रंग, भूल गए छकड़ी, तीन चीज याद रही, नून, तेल, लकड़ी।’’ वासु दा ने एक फीका सा ठहाका लगाया। मैंने महसूस किया कि वासु दा की आंखों का चुम्बकीय आकर्षण अब घनघोर दुनियादारी में बदल चुका है। वो सरलता जिसे मैं हमेशा याद करती थी, कहीं खो चुकी है। घुंघराले बालों की जगह उनका आधा सिर खल्वाट दिख रहा था।

“अपनी पत्नी से नहीं मिलवाइएगा, वासु दा।’’ मैंने कहा तो उनके चेहरे पर कुछ असमंजस का भाव आ गया। तभी भीतर से एक छोटा बच्चा भागा हुआ चला आया जिसने कमर के नीचे कुछ नहीं पहना था। मोटा काजल लगाए उस बच्चे को वासु दा ने गोद में उठा लिया और थपकने लगे, “मेरा बेटा है ये।’’ स्वर में बेटे का पिता होने का अहंकार जैसा महसूस हुआ मुझे। परदे की ओट से दो बच्चियां झांक रही थीं।

“आजकल कोयल दी आई हुई हैं यूएसए से। मिलोगे नहीं?’’

वासु दा चुपचाप बच्चे को दुलारते रहे।

“याद नहीं आती क्या कोयल दी की?’’

“पहला प्यार कोई भूलता है क्या?’’ वासु दा बहुत धीरे से बुदबुदाए। उनके चेहरे के भाव अजीब से थे। होंठ कुछ कांपे थे या मात्र मेरा वहम था।

“कोयल और उसके परिवार के सपने बहुत ऊंचे थे और मैं उन सपनों को पूरा करने में असमर्थ था।’’ वासु दा जैसे स्वयं से बोले।

उनकी बेटी चाय रख कर चली गई। मैंने चाय का घूंट लिया। बहुत मीठी थी। पी नहीं गई।

“चलती हूं वासु दा।’’

वासु दा बच्चे को गोद में उठाए हुए ही उठ खड़े हुए। मैं उन्हें देख रही थी- कहां खो गया नीली जीन्स और केसरिया कुरते वाला लड़का जो मुझे याद आया करता था। उम्र के इस मोड़ पर मुझे अचानक लगा मेरा भी पहला प्यार तो वासु दा ही थे और मैं समझ ही न सकी थी। लेकिन ये तो कोई और है। इसे तो वासु दा कहने का जी ही नहीं कर रहा।

मन में एक हूक सी उठी। मैं चली गई। जाते जाते मुड़ना चाहा, लेकिन मुड़ी नहीं। हो सकता है, वासु दा मुझे जाते हुए देख रहे हों और कोई अनचाहा मोह मुझे बांध ले। जीवन में सब कुछ पकड़ कर नहीं रखा जा सकता। कुछ न कुछ तो छूटेगा ही। यही छूटना और मिलना दुनिया है, जीवन है। कोयल दी और वासु दा छूट गए। वे अब स्मृतियों में रहेंगे।

इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, इस बार घर लौट कर मां-बाबा से अपने ब्याह के लिया ‘हां’ कह दूंगी। ये मन तो अतरंगी है, सतरंगी सपने देखता रहता है। लेकिन सपनों के पीछे भागने से कुछ हासिल नहीं होता। समझौते तो करने पड़ते हैं। कोयल दी ने किया, वासु दा ने किया और अब मुझे भी तो समझौता ही करना होगा।

– आभा श्रीवास्तव

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